कहते है वक़्त के साथ साथ बहुत कुछ बदल जाता है. चाहे हमारी सभ्यता हो या हमारी संस्कृति सब कुछ बदल गया है . हमारे धर्म का स्वरुप भी बदल गया है . लेकिन इन सबके वावजूद अगर कुछ नहीं बदला तो वो है हमारी सोच. लेकिन आज के इस भोगवाद के दौर में हमारी सोच सकारात्मक से ज्यादा नकारात्मक हो चुकी है. ये नकारात्मक सोच वाले लोग अपने आप को एन कें प्रकारें चर्चा में बने रहने की कोशिश में लगे रहते हैं ,और आज के इस टी वी युग में उन्हें लोग फटाफट इतना ज्यादा कवरेज़ मिलता है की अच्छे काम करने वालों की जगह बुरे काम या फिर नकारात्मक सोच वाले लोगों की संख्या बढती जा रही है . इस धरा पर ऐसे कई लोग हुए जो सिस्टम संस्कृति और धर्म के खिलाफ बोले और फेमस हुए, कुछ ऐसे भी है जो लोगो के सोच के खिलाफ बोलते हैं और फेमस हो जाते है . आज के इस दौर में भी कई ऐसे लोग है, और जब भी उन्हें मौका मिलता है वो अपनी नकारात्मक सोच को लोगो के बीच लाते है और लोगो की नज़रों में आ जाते है . गांधीजी के जीवन का सारांस सत्य और अहिंसा का अहिंसा शब्द भी गांधीजी का साथ छोर गए और उन्हें हिंसा का शिकार होना पड़ा पर सछ तो यह है की हम हिंसक समाज में नहीं रह सकते हिन्दा को समाप्त करने के लिया भी हिंसा का सहारा लेना पड़ता है लेकिन वो तात्कालिक होती है हम उसे अपने में उतरकर उसका हिस्सा नहीं बनते फिर हममे और उनमे फर्क क्या रह जायेगा . भारतवर्ष में रहने वे कुछ ऐसे भी लोग हैं जोआने वाली पीढी को ये बताना चाहते हैं की गाँधीजी का हत्यारा नाथूराम गोडसे एक देशभक्त था , उसके सोच को सच साबित करने में लगे हैं .इतिहास साक्षी है की वो जिस मानसिकता को लेकर गांधीजी की हत्या को अंजाम दिया उसी सोच की राजनैतिक शाखा के सर्वमान्य नेतागण जिन्ना जैसे सांप्रदायिक नेता को सेकुलर साबित करने में जुटे है और इतिहास को झुठलाना चाहते है.और जिन्ना के कब्र पर फूल चढाकर अपने आप को क्या साबित करना चाहते हैं , उन्हें यह नहीं पता की वो भी उसी साम्प्रदायिकता के शिकार हुए थे , जहाँ हजारों लोगो की हत्या हुई और लाखों बेघर होकर अपनों से बिछुड़ कर अपनी पहचान खो बैठे ,जिसके पीछे सिर्फ एक व्यक्ति का सोच था और वो था जिन्ना , मेरी नज़र में २० वी सदी का सबसे बड़ा हत्यारा , शायद ब्रिटिश हुकूमत यह जानती थी की पहले भारत आजाद हो गया तो पकिस्तान नहीं बन पायेगा ,और सभी सांप्रदायिक नेताओं को जेल और फिर फांसी दे दी जायेगी दंगे करने और राष्ट्रद्रोह के जुर्म में .लेकिन सांप्रदायिक सोच वाले ये नेता अपनी जनता के दिमाग में बसी साम्प्रदायिकता को नहीं निकाल सके, उनके बिच भी एक लकीर खिंच चुकी थी इससे आजाद होने की और देर थी उसे अंजाम तक पहुंचाने की ,रस्ते बने सोच बदली और इस भूमंडल पर एक और सरहद की रेखा खिंची गयी और बन गया बांग्लादेश , भारत आज भी भारत है इसे बांटने की कोशिश मत करो.
आडवानी आर एस एस से जुड़े नेता हैं , गोडसे भी वोही से जुड़े थे, जसवंत सिंह सेना में थे ,लेकिन राजपरिवार से जुड़े है ,रजवाडों का विलय नहीं होता तो शायद अपने आपको कहीं के राजा कहलाते ,
पाकिस्तान में रजवाडों का विलय नहीं हुआ , कबीलों से सिर्फ समर्थन लेने के लिए रखा गया , और आज भी पाकिस्तान में जो हो रहा है वो उसी जिन्ना दौर की साम्प्रदायिकता की खिंची हुई रेखाओ का आपसी द्वंद है.
यह दोनों नेता अपने आपको उस दौर की राजनीती के शिकार समझते है ,यह जिस पार्टी से आतें है वहां गाँधी के लिए कोई जगह नहीं है ,वहां सत्य , अहिंसा , सेकुलर, जैसे शब्दों की जगह नहीं है, फिर अपने आपको भारत की आज़ादी से जोड़ने के लिए एक नेता की तलाश है ,जो गाँधी का मुकाबला कर सके क्योकि आज़ादी के समय के आर एस एस के नेताओं को भारत की ९९% जनता नाम तक नहीं जानती ,इसलिए जिन्नाह का सहारा लेना पद रहा है, लेकिन जसवंत सिंह गलत समय पर गलत नाम का सहारा लेने की गलती कर बैठे, सछ तो ये है की राम नाम का सहारा लेने वाली पार्टी राम को ही भूल गयी, जिस तरह बोफोर्स का सहारा लेकर वी पि सिंह प्रधानमंत्री तो बन गए लेकिन बोफोर्स का नाम उनकी जुबान पर नहीं आया , आया तो सत्ता से बाहर होने के बाद.
मुझे एक वाकया जो राहुल गाँधी का है , मैं जिक्र कर रहा हूँ , वो है किसी तलब की खुदाई के लिए मिटटी कटना , राहुल ने मिटटी क्या काटी सारे देश के नेताओं के पैरों के निचे से जमीं खिसकने लगी.सबने जो मन में आया बोला, उन्होंने संसद में एक महिला की कहानी क्या कह दी ,सबे संसद से लेकर संसद के बाहर तक हंगामा खरा कर दिया. ट्रेन से जाते समय उनपर पत्थर बरसाए जाते हैं, ये सब हो रहा उस डर की वजह से की कही राहुल की तरफ भारत की जनता झुक गयी तो बाकी लोगो की राजनैतिक दुकानदारी बंद हो जायेगी.
रिता बहुगुणा के साथ जो हुआ वो भी मायावती की मजबूरी थी , क्योंकि वो अच्छी तरह जानती है की उनकी भी राजनैतिक जीवन समाप्ति की ओर है,
हम शशि थरूर को कैसे भूल सकते हैं , जब प्लेन के यात्रियों को उन्होंने कैटल क्लास का कह दिया तो इतना हंगामा लेकिन ट्रेन या बस में सफ़र करने वाले यात्रियों के बारे में क्या कहेंगे ?
हम अपनी नकारात्मक सोच को बदले ,क्योकि नकारात्मक सोच क्षणिक भर के लिए सुखद एहसास कराती तो है लेकिन जीवन भर के लिए दुखदायी होती है ,हमारा देश युवा है ,हमें अपनी युवाशक्ति को सही दिशा देने की जरूरत है , उन्हें निखारने की जरूरत है उन्हें तभी हम आगे बढ़ेंगे ,इतिहास से सिखाने की जरूरत है ,गलत इतिहास लिखने की जरूरत नहीं, हमें हमेशा सकारात्मक सोच के साथ आगे बढ़ना होना तभी हम अपने आपको और इस देश को नै ऊँचाई दे सकते है .
Saturday, September 19, 2009
Tuesday, September 15, 2009
भगवान् तुम्हारा भला करे:लेकिन करेंगे नहीं
रास्ते पर चलते हुए या फिर ट्रेन या बस में सफ़र करते हुए भिखारियों के मुह से या फिर किसी व्यक्ति के मुह से आपने सुना होगा "भगवान् तुम्हारा भला करे" लेकिन सच तो यह है की भगवान् किसीका भला नहीं करते वोह भी उसीका भला करते है जो सबसे ज्यादा चढावा देते है या देने की बात करते है, (चढावा का मतलब बिहार में दिए जाने वाली रिश्वत को कहेते है, जो भ्रष्ट अधिकारीयों को दी जाती है, ये भ्रष्ट अधिकारी अपने आप को भगवान् से कम नहीं समझते)
सबसे पहेले हम बात करते है शिर्डी के साईं बाबा की, जिनकी अपनी जिंदगी गरीबी में गरीबों के लिए, गरीबों के साथ व्यतीत की है, लेकिन वक़्त के साथ सब कुछ बदल जाता है, मैंने मुंबई में ऐसे बहोत से पालखी यात्रा देखे है जो मुंबई से शिर्डी तक पैदल चलकर जाते है, लेकिन उनमे से किसी का भी सामाजिक उत्थान होते नहीं देखा, समाधी के वक़्त तक एक पत्थर पे बैठ कर गरीबों की उत्थान की बात करने वाले बाबा को किसीने रजत सिंहासन देने का वादा किया, रजत सिंहासन दिया भी, कई वर्षो तक बाबा रजत सिंहासन पर ही बिराजमान रहे लेकिन उनसे गरीब दूर हो गए, आज उनके दरबार में कई तरह के पास चला करते है जो एक आम आदमी उसे पाने की सोच भी नहीं सकता, अचानक बाबा को जैसे ज्ञान की प्राप्ति हुई हो और उन्होंने खुदको गरीबों से अलग कर उस आभिजात्य वर्ग के साथ हो लिए जिसे आम लोग वी आई पी कहेते है और उस आभिजात्य वर्ग के लोगो को लगा की बाबा के लिए रजत सिंहासन आभिजात्य वर्ग का मजाक उडा रहा है, तो उन्होंने स्वर्ण सिंहासन देने का वादा किया, आज बाबा अरबों के सिंहासन पे बैठे है, ज़रा सोचिये कोई भी व्यक्ति अरबों का सिंहासन अरबों के फायदे के बाद ही दे सकते है, किसी एक व्यक्ति को अरबों का फायदा देने अच्छा है लाखों गरीबों को लाखों का फायदा देना, लेकिन लाखों का फायदा पाने वाले लोग बाबा को अरबों के स्वर्ण सिंहासन पर नहीं बिठाते,
दुसरे नम्बर पर मुंबई के गणपति जी, उनका भी येही हाल है जो ज्यादा चढावा देता है, गणपति जी उनके साथ होते है, उन्हें भी आभिजात्य वर्ग की संगती अछि लगती है, चाहे वोह सिद्धिविनायक हो, लाल बाग का राजा हो, या फिर कोई और गणपतिजी, जितना ज्यादा चढावा चढायेंगे गणपति जी आप पर उसी हिसाब से खुश होंगे,
तीसरे स्थान पे आते है तिरुपति बालाजी, वोह भी गरीबों से दूर ही रहेते है ऐसा नहीं होता अगर तो प्रजा राज्यम पार्टी को एक सीट भी जरूर मिल जाती, लेकिन अभिनेता से नेता बने चिरंजीवी को यह बात समझ में नहीं आयी, और वोह तिरुपति बालाजी के दरबार से खाली हाथ लौट गया,
गरीबों के भगवान् वही बसते है जहा सिर्फ गरीब जाते है, उस मंदिर में आभिजात्य वर्ग के लोग जाने से कतराते है, और अगर जाते भी है, तो उस मंदिर की सारी खुशियाँ जो गरीबों की होती है खुद ले जाते हैं और गरीबों के भगवान् और गरीब को उसी जिल्लत की जिंदगी में छोड़ जाते है,
अगर अब अगर कोई कहे की भगवान् भला करे तो सोचना ...........
सबसे पहेले हम बात करते है शिर्डी के साईं बाबा की, जिनकी अपनी जिंदगी गरीबी में गरीबों के लिए, गरीबों के साथ व्यतीत की है, लेकिन वक़्त के साथ सब कुछ बदल जाता है, मैंने मुंबई में ऐसे बहोत से पालखी यात्रा देखे है जो मुंबई से शिर्डी तक पैदल चलकर जाते है, लेकिन उनमे से किसी का भी सामाजिक उत्थान होते नहीं देखा, समाधी के वक़्त तक एक पत्थर पे बैठ कर गरीबों की उत्थान की बात करने वाले बाबा को किसीने रजत सिंहासन देने का वादा किया, रजत सिंहासन दिया भी, कई वर्षो तक बाबा रजत सिंहासन पर ही बिराजमान रहे लेकिन उनसे गरीब दूर हो गए, आज उनके दरबार में कई तरह के पास चला करते है जो एक आम आदमी उसे पाने की सोच भी नहीं सकता, अचानक बाबा को जैसे ज्ञान की प्राप्ति हुई हो और उन्होंने खुदको गरीबों से अलग कर उस आभिजात्य वर्ग के साथ हो लिए जिसे आम लोग वी आई पी कहेते है और उस आभिजात्य वर्ग के लोगो को लगा की बाबा के लिए रजत सिंहासन आभिजात्य वर्ग का मजाक उडा रहा है, तो उन्होंने स्वर्ण सिंहासन देने का वादा किया, आज बाबा अरबों के सिंहासन पे बैठे है, ज़रा सोचिये कोई भी व्यक्ति अरबों का सिंहासन अरबों के फायदे के बाद ही दे सकते है, किसी एक व्यक्ति को अरबों का फायदा देने अच्छा है लाखों गरीबों को लाखों का फायदा देना, लेकिन लाखों का फायदा पाने वाले लोग बाबा को अरबों के स्वर्ण सिंहासन पर नहीं बिठाते,
दुसरे नम्बर पर मुंबई के गणपति जी, उनका भी येही हाल है जो ज्यादा चढावा देता है, गणपति जी उनके साथ होते है, उन्हें भी आभिजात्य वर्ग की संगती अछि लगती है, चाहे वोह सिद्धिविनायक हो, लाल बाग का राजा हो, या फिर कोई और गणपतिजी, जितना ज्यादा चढावा चढायेंगे गणपति जी आप पर उसी हिसाब से खुश होंगे,
तीसरे स्थान पे आते है तिरुपति बालाजी, वोह भी गरीबों से दूर ही रहेते है ऐसा नहीं होता अगर तो प्रजा राज्यम पार्टी को एक सीट भी जरूर मिल जाती, लेकिन अभिनेता से नेता बने चिरंजीवी को यह बात समझ में नहीं आयी, और वोह तिरुपति बालाजी के दरबार से खाली हाथ लौट गया,
गरीबों के भगवान् वही बसते है जहा सिर्फ गरीब जाते है, उस मंदिर में आभिजात्य वर्ग के लोग जाने से कतराते है, और अगर जाते भी है, तो उस मंदिर की सारी खुशियाँ जो गरीबों की होती है खुद ले जाते हैं और गरीबों के भगवान् और गरीब को उसी जिल्लत की जिंदगी में छोड़ जाते है,
अगर अब अगर कोई कहे की भगवान् भला करे तो सोचना ...........
Bihar Ka Shiksha Mitra Ghotala: Sabse Bada Megha Ghotala
बिहार में शिक्षा मित्र की शुरुआत तत्कालीन मुख्यमंत्री राबड़ी देवी के शाशन काल में हुई थी लेकिन शिक्षामित्र फेज़ २ की शुरुआत वर्तमान मुख्यमंत्री नीतिश कुमार जी के कर कमलों द्वारा संपन्न हुआ. जिसमे असीमित घोटाले हुए. कही कही तो उच्च अंक प्राप्त अभ्यर्थी की जगह पैसे लेकर ऐसे लोगो को शिक्षा मित्र बनाया गया है जो कही से भी उस पद के लायक नहीं थे. जिनका कोउन्सल्लिंग भी नहीं हुआ था, पैसे की माया ने इस मेघा घोटाले को पूरी तरह ढक दिया. अभी भी बिहार के प्रखंड से लेकर जिल्हे तक और जिल्हे से लेकर मुख्यमंत्री कार्यालय तक सेकडों की तादाद में शिकायत दर्ज है, जिसका निबटारा नीतिश जी के आदेश के बावजूद अभी तक नहीं हुआ है, क्यों की अभ्यर्थी और उनके रिश्तेदार साथ में पंचायत के मुखिया पंचायत सेवक प्रखंड शिक्षा पदाधिकारी प्रखंड विकास पदाधिकारी आपस में मिलकर पैसे के बल पर गलत रिपोर्ट देते है या फिर रिपोर्ट भेजते ही नहीं जिससे बिहार का अब तक का सबसे बड़ा मेघा घोटाला आज भी फाइलों में ही बंद है, जिसका निष्पादन शायद संभव नहीं. इसके लिए जिस निति की ज़रुरत है वह निति नीतिश जी के पास नहीं है. शिक्षा मित्र की बहाली के लिए जो गाइड लाइन बनाये गए थे वह प्रकाशित होने के बाद हर बार, बार बार, लगातार इतनी बार की लिख नहीं सकते बदले गए, जिसके चलते हमेशा से शिक्षा मित्र फेज़ २ विवादस्पद रही है, कुछ और न सही कम से कम जिन लोगो के उपर शिकायत दर्ज की गयी है उनका तो निष्पादन हो जाये ताकि इस मेघा घोटाले के पाप से नीतिश जी को थोडी मुक्ति मिल जायेगी.
ऐसे ही एक अभ्यर्थी है जिन्होंने अपनी शिकायत दर्ज करवाए लेकिन नीतिश जी के आदेश के बावजूद उन्हें न्याय नहीं मिल पाया, उन्होंने अपनी शिकायत जिल्हा मधुबनी प्रखंड बेनीपट्टी ग्रामपंचायत राज करहरा के शिक्षा मित्र सुरेन्द्र राय के खिलाफ दर्ज कराई थी उस समय से लेकर आज तक लग भग २३ महीनो में दर दर भटकने के बावजूद अभी तक न्याय नहीं मिला.
सारे घोटाले के पीछे का सच यह है की सुरेन्द्र राय का शिक्षा मित्र के कोउन्सल्लिंग के लिए बने पैनल में नाम नही होने के बाद भी वोह आज शिक्षा मित्र है जबकि फायनल कोउन्सल्लिंग करने वाले छात्र आज भी शिकायते दर्ज कर न्याय की आस में दर दर भटक रहा है, यह सब संभव हुआ करहरा पंचायत के तत्कालीन पंचायत सेवक जीबछ पासवान, प्रखंड शिक्षा पदाधिकारी कपिलेश्वर पासवान, प्रखंड विकास पदाधिकारी अजय पासवान, करहरा पंचायत के मुखिया अतीक अंसारी, पूर्व मुखिया देवेन्द्र यादव ने ५५००० रुपये लेकर सुरेन्द्र राय को शिक्षा मित्र बना दिया जबकि सुरेन्द्र राय को मात्र ५८% ही अंक थे, उनकी कोउन्सल्लिंग हुई ही नहीं थी क्योकि पेनल लिस्ट में नाम ही नहीं था, जिसका कोउन्सल्लिंग ५ और ६ नवम्बर २००७ को हुआ था जिसे ६८% अंक थे उसे शिक्षा मित्र नहीं बनाया गया. इस बात की चर्चा बिहार के समाचार पत्र हिन्दुस्तान में दिसम्बर के अंतिम सप्ताह में किया गया था. ज्ञात हो की ६८% वाले एक मात्र अभ्यर्थी को शिक्षा मित्र न बनाकर ५८% वाले सुरेन्द्र राय को १९ नवम्बर २००७ को शिक्षा मित्र बना दिया गया. वर्तमान मुख्यमंत्री नीतिश जी के इस साल जनुअरी/ फरवरी २००९ को बिहार भ्रमण के दौरान जिल्हा मधुबनी के ही धकजरी में हुए जनता दरबार में शिकायते दर्ज कराने के बाद उन्होंने राजीव भूषण जी को नियुक्त कर जल्द से जल्द एक महीने के अन्दर न्याय दिलाने की बात कही थी लेकिन ८ महीने बीतने के बाद भी अभी तक न्याय नहीं मिल पाया १०% ज्यादा अंक पाने के बाद भी बिहार में शिक्षा मित्र बनना मुश्किल है क्यों की चुनाव से पहेले किये गए वादे जीत हासिल होने पर सत्ता के मद में उन्हें यह याद नहीं रहता की धीरे धीरे कब वोह जनता से दूर होकर उसकी नफरत बन गए है, नीतिश जी को शायद यह बात चुभती हो पर कभी कांग्रेस के गढ़ रहे बिहार या फिर लालूजी राबडी जी के बिहार, सबो को बिहार की जनता ने अपनी नफरत का शिकार बनाया.
मैं नीतिश जी से उम्मीद करता हूँ की अपने शाशन काल में हुए सबसे बड़े मेघा घोटाले की शिकायतों को खुद्द अपने हाथों में लेकर सरकार से उम्मीद लगाये मेघावी छात्रों को उन्हें सच में न्याय दे. और उम्मीद करते है की इस घोटाले से जुड़े सारे लोगो को सजा मिले जो संभव नहीं दीखता. ये वही नीतिश जी है जो सत्ता में आते ही एंटी करप्शन विभाग द्वारा भ्रष्ट्राचारियों पर नकेल कस कर एक उम्मीद की किरण दिखाई दी थी, लेकिन बिहार की जनता अब न उम्मीद हो चुकी है. भले ही लोक सभा चुनाव में जीत हासिल कर अपनी पीठ थप-थपा रहे हो लेकिन दीपक की लो से हम रौशनी की उम्मीद क्या कर सकते है. बस यही उम्मीद है की शिक्षा मित्र में हुए घोटाले की निष्पक्ष जांच कर न्याय देने की कोशिश करें.
ऐसे ही एक अभ्यर्थी है जिन्होंने अपनी शिकायत दर्ज करवाए लेकिन नीतिश जी के आदेश के बावजूद उन्हें न्याय नहीं मिल पाया, उन्होंने अपनी शिकायत जिल्हा मधुबनी प्रखंड बेनीपट्टी ग्रामपंचायत राज करहरा के शिक्षा मित्र सुरेन्द्र राय के खिलाफ दर्ज कराई थी उस समय से लेकर आज तक लग भग २३ महीनो में दर दर भटकने के बावजूद अभी तक न्याय नहीं मिला.
सारे घोटाले के पीछे का सच यह है की सुरेन्द्र राय का शिक्षा मित्र के कोउन्सल्लिंग के लिए बने पैनल में नाम नही होने के बाद भी वोह आज शिक्षा मित्र है जबकि फायनल कोउन्सल्लिंग करने वाले छात्र आज भी शिकायते दर्ज कर न्याय की आस में दर दर भटक रहा है, यह सब संभव हुआ करहरा पंचायत के तत्कालीन पंचायत सेवक जीबछ पासवान, प्रखंड शिक्षा पदाधिकारी कपिलेश्वर पासवान, प्रखंड विकास पदाधिकारी अजय पासवान, करहरा पंचायत के मुखिया अतीक अंसारी, पूर्व मुखिया देवेन्द्र यादव ने ५५००० रुपये लेकर सुरेन्द्र राय को शिक्षा मित्र बना दिया जबकि सुरेन्द्र राय को मात्र ५८% ही अंक थे, उनकी कोउन्सल्लिंग हुई ही नहीं थी क्योकि पेनल लिस्ट में नाम ही नहीं था, जिसका कोउन्सल्लिंग ५ और ६ नवम्बर २००७ को हुआ था जिसे ६८% अंक थे उसे शिक्षा मित्र नहीं बनाया गया. इस बात की चर्चा बिहार के समाचार पत्र हिन्दुस्तान में दिसम्बर के अंतिम सप्ताह में किया गया था. ज्ञात हो की ६८% वाले एक मात्र अभ्यर्थी को शिक्षा मित्र न बनाकर ५८% वाले सुरेन्द्र राय को १९ नवम्बर २००७ को शिक्षा मित्र बना दिया गया. वर्तमान मुख्यमंत्री नीतिश जी के इस साल जनुअरी/ फरवरी २००९ को बिहार भ्रमण के दौरान जिल्हा मधुबनी के ही धकजरी में हुए जनता दरबार में शिकायते दर्ज कराने के बाद उन्होंने राजीव भूषण जी को नियुक्त कर जल्द से जल्द एक महीने के अन्दर न्याय दिलाने की बात कही थी लेकिन ८ महीने बीतने के बाद भी अभी तक न्याय नहीं मिल पाया १०% ज्यादा अंक पाने के बाद भी बिहार में शिक्षा मित्र बनना मुश्किल है क्यों की चुनाव से पहेले किये गए वादे जीत हासिल होने पर सत्ता के मद में उन्हें यह याद नहीं रहता की धीरे धीरे कब वोह जनता से दूर होकर उसकी नफरत बन गए है, नीतिश जी को शायद यह बात चुभती हो पर कभी कांग्रेस के गढ़ रहे बिहार या फिर लालूजी राबडी जी के बिहार, सबो को बिहार की जनता ने अपनी नफरत का शिकार बनाया.
मैं नीतिश जी से उम्मीद करता हूँ की अपने शाशन काल में हुए सबसे बड़े मेघा घोटाले की शिकायतों को खुद्द अपने हाथों में लेकर सरकार से उम्मीद लगाये मेघावी छात्रों को उन्हें सच में न्याय दे. और उम्मीद करते है की इस घोटाले से जुड़े सारे लोगो को सजा मिले जो संभव नहीं दीखता. ये वही नीतिश जी है जो सत्ता में आते ही एंटी करप्शन विभाग द्वारा भ्रष्ट्राचारियों पर नकेल कस कर एक उम्मीद की किरण दिखाई दी थी, लेकिन बिहार की जनता अब न उम्मीद हो चुकी है. भले ही लोक सभा चुनाव में जीत हासिल कर अपनी पीठ थप-थपा रहे हो लेकिन दीपक की लो से हम रौशनी की उम्मीद क्या कर सकते है. बस यही उम्मीद है की शिक्षा मित्र में हुए घोटाले की निष्पक्ष जांच कर न्याय देने की कोशिश करें.
Monday, September 14, 2009
CST Mein Bheekhari aur chor Ticket Clerck Hain
Mai 4 september ko CST terminus Mumbai par raat ko 9 baje pahuncha, wahan se 11:25pm ko Chhutane wali Superfast train se ek frinds (jiska ticket confirm tha) Ko c/o karne gaya tha, Wahan par pata chala ki ek aur uske friends without reservation ke uske saath ja raha hai. Mujhe gussa to bahut aaya par kuchh bol nahi saka. Main uske liye general ticket lene ticket counter par gaya to wahan ka nazara dekh kar hairan ho gaya. Ticket counter pa jitne bhi ticket clerck baithe mile wo sabhi kasab jaise terroriston se jyada bhayanak lage.Sabse pahale main mail gadiyon ke liye jo ticket counter hai wahan par (jis taraf 26 / 11 / 2008 ke Shaheedon ke yaad mein shradhanjali arpit karne ke liye patthar lagaye gaye hai) main platform ticket wale counter ke baad 3rd counter par line mein lag kar jab 2nd no. par tha , aur jo maine dekha woh terroriston ke aatank se bhi jyada bhayanak laga. Mujhse aage wale yaatri ne shirdi ke ticket ke liye 450 rupaye diye (100 ke do note aur 50 ke 5 note) lekin badi haath ki safai se usne 50 ka ek note neeche gira diya aur bade pyar se bola tumne mujhe 400 rupaye diya 50 aur laao.Aur usne 50 aur lekar hi tcket diye (ticket 432 rupaye ka tha). Itne mein mere left side mein ticket clerk ne galiyon ki shuruaat kar di woh lagataar do ladkon ko galiyan diye ja raha tha, sirf isliye ki usne 6 rupaye dene mein der kardi thi, 10 ka note diya to usne baaki 4 rupaye nahi loutaye,saath mein galiyaan dekar chillaya, aur bola mere wale counter par baithe ticket clerck se "kisi saale bhaiyye ko ticket mat dena" Jab mera no. aya to usne wohi kiya usne mujhe ek line mein jawab diya "Yahan par bhaiyye ko ticket nahin milta hai,yeh counter sirf Marathiyon ke liye hai, tum Marathi hai" Mujhe Patna ka Train no.2141 superfast exp.ka ticket chahiye tha ,mere baar baar kahane ke baavjood usne ticket nahi diya. Jab ki har ticket counter par likha hai kahi se bhi kahi ka ticket le sakte hai. tab main reservation counter side wale ticket counter pe gaya, north se second counter par baithe ticket clerk ne mujse 253 rupaye(Mumbai to Patna) ki jagah 263 Rupaye liye, jab maine usse pucha "10 rupaye zyada kyo liye" to usne bola "superfast ka 10 rupaye extra lagta hai." jab maine use ticket dikhakar bola "ticket ka kimat to 253 rupaye hi hai" to usne bola "humlog 10 rupaye zyada lete hai" mere chillane ke baad 5min. ke baad usne 10 Rupaye wapas kiye. uske bagal main sarvajanik shauchalaya hai jisme bhi urinal(pesab karne ka) ka bhi 1 ya 2 Rupye lete hai, jab ki board pe urinal free likha hai.ye wohi CST Station hai jahan nafrat ke shikar bante uttar bhartiyon ne hi un railway staff ki apni jaan par khelkar,unki jaan bachayi thi. chaahe woh chay wala ho ya jhillu yadav jaise police karmi ho, ya phir NBT (Navbharat Times) ke patrakar Cameraman ho ya phir NSG ke Commando ho. ye sabhi bhartiya hone ka saboot dete hai lekin bhartiya rail main kaam karne wale yeh karmchari bhartiyata ko chhor kshetriyata ka gun gaan karte hai, aur jo unke liye jaan ki baazi lagate hai unhi ko gaali dete hai. dusri aur ticket ke zyada paise lena unki aadat ban chuki hai, pata nahi ye bhikh hai ya rishwat. agar bhikh hai to road par bhikh mange, aur rishwat hai to khulkar maange.
main rail mantralaya se ummeed karta hoon ki aise bhikhariyon ya rishwat khoron ko kum se kum ticket counter par na rakhe, shayad yehi wajah hai ki pichle 5saal ko chhor kar railway hamesha ghaate (loss) main rahi hai.
main rail mantralaya se ummeed karta hoon ki aise bhikhariyon ya rishwat khoron ko kum se kum ticket counter par na rakhe, shayad yehi wajah hai ki pichle 5saal ko chhor kar railway hamesha ghaate (loss) main rahi hai.
Thursday, September 10, 2009
Bihar Ka Vikas Sambhav Nahi
Sunkar Ascharya na kare, yeh sach hai Bihar ka vikas sambhav nahi hai, sabse pahele Badh (flood) yeh Uttar Bihar ka sabse bada abhishap hai, Ganga ke Uttari Bhag mei rahene wale log saal ke char mahine apne kheton ko badh ke pani me dube hue sirf dekh sakte hai pani ke uper kheti nahi kar sakte. badh ko rokne ke liye jo nitiyan honi chahiye woh Bihar sarkar ke paas to kya Bharat sarkar ke paas bhi nahi hai. Ek baar President rahte huye A.P.J.Kalam ne apna plan bataya tha lekin unke plan ko filon mein hi rahane diya gaya. Sach to ye hai ki agar plan ko amal mein laya jata to shayad bihar ko badh se nijaat mil jaati aur uttar bihar ki kheti phir se lehlaha uthti jisse Bihar mein khushhali aa sakti hai.Lekin aisa nahi ho sakta.Doosari taraf Shiksha (Education) Hai jinke kandhon par woh rote hain paiso ko lekar,Bihar ke Shikshak (Teacher) Ko woh sab kuchh milta hai jo woh chahate hai,lekin unhe bhi shikshan karyon se alag kar doosare kaamo mein lagakar shiksha ka satyanash kar dala hai yeh kaam aaj se nahin jamaane se chala aa raha hai.Unhe (teacher Ko) ek saal mein mein lagbhag kul milakar 6 mahine chhutti ya phir doosare sadhno mein lagaya jaata hai,baaki ke 6 mahine hartaal (Strike) ya phir French (French ka matlab bina application ke chhutti) maarkar kam chalate hai, Kabhi bihar shiksha pariyojna to kabhi panchayato ke bina matlab ke kaam ke liye school se gayab rahete hai, ab ek naya shigufa ya mazak hai shiksha mitra ka jinka shiksha mitra ke naam par shoshan kiya jata hai, unhe panchayat ke mukhiyon ne 100rupaye har mahine kamishan lekar payment dete hai 150rupye lekar deputation dete hai, 500rupaye lekar mahine bhar ki chutti de dete hai, ek tarah se dekha jaye to shiksha mitra ki tisri bahali main jo abhi chal rahi thi usme unhi logo ko liya gaya jo log 75000 se lekar 200000 rupye tak chadhava diye hai(Chadhava ka matlab mukhiya se lekar BEO hi nahi, DEO tak ko hissa milta hai Saath mein BDO,Kabhi kabhi Local MLA tak ko Bhi hissa milta hai) ab hum kaise ummid kar sakte hai ki Bihar main garibon ko nyaay milega. 10 saal baad sharbi bihar ke yuva kya kisi office ke peon ke layak bhi rah payenge, jab berozgari badhegi tab apradh bhi badhega, tab ki soch kar rooh kanp jati hai, abhi BPSC ka haal yeh hai ki kaee saalon ke Exam ko ek saath liya ja raha hai, yeh meghavi chhatro ke bhavishya ko barbaad karne se zyada kuch nahi hai, kuch vibhago main to khali jagaho ko apne rishtedaron se hi bhar diya jata hai, haal to yeh hai ki rojgaar ke naam par thekedari hi bachi hai jaha par 40% kamishan dekar kaam liye jate hai jo paheli barish main hi dhul jate hai, sadko ka haal sirf aisa hai ki national highway ke alawa koi bhi sadak sahi nahi hai, National highway ka bhi abhi kaam chalu hai, iske alawa do number iient (Brick) se banne wali sadak barish ke baad chalne layak nahi rah jati hai.
pahele to log awaz bhi uthate the shikayate bhi karte the lekin is panchayati raj wale Bihar main abhi panchayaton main bhi shikayat karne se pahele sau baar sochte hai kyon ki sharab ka nasha laathi ke nashe ke saamne choti pad jati hai, ab bhala koi aam insaan kaise soch sakta hai ki Bihar ka vikas sambhav hai.
pahele to log awaz bhi uthate the shikayate bhi karte the lekin is panchayati raj wale Bihar main abhi panchayaton main bhi shikayat karne se pahele sau baar sochte hai kyon ki sharab ka nasha laathi ke nashe ke saamne choti pad jati hai, ab bhala koi aam insaan kaise soch sakta hai ki Bihar ka vikas sambhav hai.
Sharab mein Doobi Bihar
Bihar Ke Mukhyamantri (CM ) Nitish Kumar ne bihar ko koshi ki badh se jyada to sharab mein dubo diya. India mein bahut kam logon ko maloom hai ki Bihar mein khane ke dukaan se jyada sharab ki dukaan hai. Aur iska sehara Nitish ji ke sar hai. Bihar main panchayaton ki sankhya 8471 hai, Bihar Sarkar ke website ke anusaar 11653 hai aur licensee sharab ki dukaan lagbhag 4000 se zyada hai, uske saath lagbhag 100000 se zyada anouthorized local retailer jude hue hai, Bihar ki aabadi 8cr. hai, isika matlab lagbhag 550 logo pe ek sharab ki dukaan hai, itna hi nahi aap agar Bihar mein kahi bhi jayenge har nukkad pe sharab ki do char botal bechne wale mil jayenge, sham hone ke baad 2000 ki aabadi wale gaon mein bhi koi bhi aadmi aapko hosh mein dikhaee nahi padenge, isse zyada Bihar ka vikas aur kya ho sakta hai. Nitish kumar ji ki niti hai 65 rupaye bhi kamao to kam se kam 28 rupaye daru pe kharch karo taki election hum garibon ke paise se lad sake. Sidhi si baat hai jaha par 37 rupaye mein avarage 5 logo ka pet palta ho (patni aur teen bachhe) waha education ka kya haal hoga kalpna karte hi hosh ud jaate hai.Bihar ka isse Zyada vikas Nitish Ji ke kar kamlon dwara hua hai.
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